करामात (13)
बाबा हुजूर के यहां हर मज़हबो मिल्लत और आमो खास लोग मुलाकात के लिये हाजिर हुवा करते थे। इसी सिलसिले मे बनेड़ दरबार के मुलाज़िम हमीद खाँ साहब हाज़िर हुवे। बाबा हुजूर कीखिदमत में काफी देर रहने के बाद बनेड़ा जाने की इज़ाजत चाही तब बाबा हुजूर ने जाने से मना फरमाया। जब हमीद खाँ ने बार-बार असरार किया तो बाबा हुजूर ने फरमाया हमीद खाँ आज तुम बनेड़ा नहीं जा पाओगे क्योकि तुम्हारे रास्ते की नदी में पानी बहुत बह रहा हैं तब हमीद खाँ ने अर्ज किया ! हुजूर कहीं भी बादल नजर नहीं आ रहे हैं। और अभी बारिश का वक्त नहीं है। तब बाबा हुजूर ने फरमाया बारिश का मौसम नहीं है मगर नदी में पानी पूरे आबो ताब से बह रहा है। और तुम अगर सबूत देखना चाहते हो तो देख लो। आपने अपना हाथ जमीन पर मारा और हाथ को ऊपर उठाया और फरमाया यह लो उसी नदी की मछली । और हमीद खाँ क्या देखते है कि बाबा हुजूर के हाथ में मछली है और पूरा हाथ पानी से तर बतर है, हाथ पर रेत भी लगी हुवी है और पानी की बूंदे नीचे गिर रही है। हमीद खाँ ने जब यह माजरा देखा तो बाबा हुजूर के कदम थाम लिये। और वहीं और जब हमीद खाँ उस नदी के यहां पहुंचे तो लोगो ने बताया कि कल नदी का पानी तो नदी के किनारों से भी ऊपर बह रहा था। और पानी अब कम हुवा है। हमीद खाँ के दिल में ख्याल आया न बारिश है ना बारिश का मौसम है कुदरत का अजीब करिश्मा है और हकीकत है अल्लाह के वली रोशन ज़मीर होते हैं। यह वाकेआ हमीद खाँ सा. ने बनेड़ा जाकर दरबार को सुनाया। पूर्व सांसद व हाल बनेड़ा दरबार जनाब पराक्रम सिंह जी 63 वें उर्स में जियारत के लिये दरगाह शरीफ तशरीफ लाएं तब उन्होनें यह वाकेआ सुनाया।
जरा संभलकर फकीरो से तबसरा करना ।
ये लोग पानी भी सुखी नदी से लेते हैं।