
करामत (4)
बाबा हुजूर की सोहबत में कई लोग अपना फर्ज़ समझकर मजलिस में हाज़िर रहा करते थे। और हस्बे नियत फैज़याब होते रहते । एक मरतबा बाबा हुजूर से कासम मंगलिया ने अर्ज़ किया! हुजूर हमें भी अमल बख्शीए। बाबा हुजूर मौज में आ गए, आलमें मौज में आकर इरशाद फरमाया। ये आयत याद कर चालीस रोज़ तक बाद नमाज़ ईशा इस आयत का विर्द इस ढंग से करो। जब तुम मंज़िल पर पहुंच जाओ तो फलां फलां चीज़ को मिलाकर यह आयत पढकर दम कर देना । इन्शा अल्लाह वोह चीज़ चांदी बन जाएगी। आलमे मोज का फरमान था और उस शख्स ने इस वज़ीफे को शुरू कर दिया। चालीस रोज़ बाद उन तमाम चीज़ों को इकट्ठा कर उस आयत को पढकर दम किया तो वोह चीज़ हकीकत मे चांदी बन गई। उसे बाज़ार में बेचकर रूपये हासिल कर लिए। वह शख्स आराम से खाने पीने लगा और जब जब ज़रूरत होती तो इस तरह चांदी बनाकर बाज़ार में बेचकर रूपये हासिल कर लेता। धीरे धीरे वोह शख्स बाबा हुजूर की सोहबत से दूर रहने लगा। क्योकि उसका मतलब हल हो चुका था। एक रोज़ बाबा हुजूर का गुज़र उसके मकान की जानिब से हुआ तो क्या देखा? उसके से आंगन में मुर्गे–मुर्गियां काजू बादाम खा रही है। बाबा हुजूर के कदम ठहर गए। आवाज़ दी कासम यह मुर्गे मुर्गियां क्या खा रही है? कासम ने जवाब दिया – बाबा हुजूर ये काजू बादाम खा रही है, इस पर आपने फरमाया, ये गिज़ा अल्लाह तआला ने इंसानों के लिए बनाई है तुम जानवरों को खिला रहे हो ? इस पर जवाब मिला हुजूर पैसो की कोई कमी नहीं है। अगर ये काजू बादाम खायेंगे तो इनका गोश्त लज़ीज़ होगा। इस पर बाबा हुजूर ने इज़हारे अफसोस फरमाया और इरशाद फरमाया अच्छा ठीक है। और आप हुजरे में आकर आराम फरमाने लगे। इसके बाद उस शख्स ने चांदी बनाना चाहा मगर चांदी नहीं बन सकी, हर चंद कोशिश करके देख ली। दौड़ा-दौड़ा बाबा हुजूर की बारगाह में हाजिर हुआ, और अर्ज किया हुजूर चांदी नहीं बन रही है। बाबा हुजूर ने फरमाया तुम अमल भूल गए होंगे। उस शख्स ने जवाब दिया हुजूर मुझे याद है और पढ़कर सुना दिया। तब आपने फरमाया "ये अल्लाह की मर्ज़ी है इसमें मैं क्या कर सकता हूँ। वो शख्स आपके कदमों में गिरकर खूब गिड़गिड़ाया, मगर आपने तवज्जो न फरमाई। उसके बाद वोह शख्स अपनी ज़िन्दगी में कभी चांदी नहीं बना सका।