करामात (2)
बाबा हुजूर एक मरतबा दौराने सफर थे। आपके हुजराए शरीफा में चोरी की नियत से एक शख्स दाखिल हो गया और हुजरे में तलाशी लेना शुरू की। हस्बे नियत कोई चीज़ दस्तयाब न हो सकी। वो गुस्से में आ गया सोचने लगा आपके यहां बड़े-बड़े लोग आते है, बेश कीमती चीजे, नज़ करते है मगर यहां तो कुछ नज़र नहीं आ रहा है। आनन फानन में किताबों पर नज़र पड़ी सभी किताबों को उठाया, कपड़े में बाँधा और कलाल के कुएँ में डाल दिया। बाबा हुजूर ने सफर से अहमद मुल्ला को खबर भिजवाई कि मेरे हुजरे में चोरी हो गई है उसका पता लगाओ। अहमद मुल्ला ने कपासन के थानेदार को भी इत्तला दी और आम चर्चा फैल गई। लेकिन न चोर का पता लगा न चोरी किए हुए माल का पता चला। दिन गुज़रने के बाद बाबा हुजूर कपासन तशरीफ लाए, तब अहमद मुल्ला ने सब हाल हकीकत सुनाई। सुनते ही आप को जलाल आ गया। आलमे जलाल में आपने फरमाया। "फलाँ शख्स को हाजिर करो" फौरन उस शख्स को आपकी बारगाह में हाजिर किया गया, उसके आते ही आपने पुर जलाल लहज़े में इरशाद फरमाया मेरी किताबें कहाँ है? तुम बताते हो या मै बताऊं आपकी आवाज़ में वोह असर था कि वोह आपके कदमो में गिर गया। अर्ज़ किया हुजूर मुझे माफ कर दो आइन्दा ऐसी हरकत नहीं करूंगा। किताबें तो मैने कलाल के कुएँ में डाल दी है जो पानी से भरा हुआ है, हुजूर अब कैसे लाऊँ । तब आपने मुल्ला अहमद को हुक्म फरमाया, इसके साथ जाओ और मेरी किताबें निकाल कर लाओ। हुक्म पाते ही मुल्ला अहमद उस शख्स के साथ कुएँ पर पहुंचे। और लोहे का आला (बलाई) कुएं में डाला तो कोई चीज़ उसमें फंस गई। वज़न महसूस हुआ उसे खींचकर बाहर निकाला तो क्या देखते है ? कपड़े के बण्डल में तमाम किताबें बंधी हुई है, उसको खोलकर जब देखा तो किताबों पर पानी का असर न था और एकदम सुखी किताबें निकली, जो बाबा हुजूर की खिदमत में पेश कर दी गई। तब बाबा मुस्कराए और आइंदा चोरी नही करने की हिदायत देते हुए शख्स को माफ फरमा दिया।