
(करामात-1)
बाबा हुजूर महल्ला मौमिनान में अपने हुज़रे शरीफा में कयाम पज़ीर रहते। हर तरह के लोग आपकी खिदमत में हाजिर होते । बाबा हुजूर उनसे उसी पेराए पर गुफ्तगू फरमाते । आम लोग बाबा हुजूर को एक आम दुर्वेश की शक्ल में जानते थे। अल्लाह के वलियों का यह दस्तूर रहा है कि जिन पर आप तवज्जों फरमाते वो ही आपकी हकीकत को पहचान पाते बाकी नहीं पहचान सकते । महल्ला मौमिनान में गुरबत का आलम था। जहालियत का दौर दौरा था । लेकिन उनमें खुलुसों मोहब्बत थी। बाबा हुजूर एक मरतबा इनके रवैया से आजिज़ आ गए तबीयत परेशान हो गई और झुंझलाकर इरशाद फरमाया "अब हम तुमको छोड़कर चले जायेंगे” वोह लोग बाबा हुजूर के मुँह लगे हुए थे मगर बेपनाह मोहब्बत रखते, लेकिन हकीकत से नावाकिफ थे। उन्होंने जवाब दिया आप हमको छोड़कर कैसे चले जायेंगे ?हम आपको रस्सी लेकर इस नीम से बांध देंगे। उस पर बाबा हुजूर ने कहा, अच्छा बांधकर देख लो और आप नीम के तने के पास जाकर खड़े हो गए। आपको मुल्ला अहमद और उनके साथियों ने कसकर बांध दिया जब बाँधकर फारिग हुए तो क्या देखते है कि रस्सी एक जानिब है और बाबा हुजूर अलग खड़े हुए मुस्करा रहे है। तब अहमद मुल्ला कहा हुजूर रस्सी में गिरह (गांठ) सही नहीं लगी थी अब बांधेगें। बाबा हुजूर ने उनकी दरख्वास्त फिर कबूल फरमाई और तने के पास जाकर खड़े हो गए, फिर अहमद मुल्ला और उनके साथियों ने दुबारा ने रस्सी से कसकर बांधा और बड़ी होशियारी से गांठे लगाई, तब बाबा हुजूर ने फरमाया, "मुल्ला अहमद अपनी गांठे और देख लो, ”तब मुल्ला अहमद ने अर्ज़ किया हुजूर अब आप रस्सी खोलकर दिखा दो। आन की आन में मुल्ला अहमद और उनके साथियों ने देखा कि बाबा हुजूर की रस्सीयां नीम के तने से लिपटी हुई है और आप दूर खड़े होकर मुस्करा रहे है। जब लोगों ने यह मंज़र देखा तो आपके कदम थाम लिए और अर्ज़ किया। हुजूर हम बांधकर आपको नहीं रोक सकते, लेकिन हमारी मोहब्बत का वास्ता, आप हम गरीबो को छोड़कर न जाए। बाबा हुजूर ने मुस्करा कर फरमाया " अच्छा मेरे कदम छोड़ो, हम तुमको छोड़कर नहीं जायेंगे। कपासन को शरफ हासिल है इनकी ज़ाते अकदस से। के है इस गांव में रोज़ा मेरे दीवाना बाबा का ।